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पूस की रात: मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी

पूस की रात: मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी

पूस की रात 
-मुंशी प्रेमचंद 

पूस की ठंडी रात में खेत की रखवाली करने गया हल्कू क्यों नीलगायों द्वारा फसल बर्बाद करने के बावजूद ख़ुश था? खेती-किसानी की बदहाली पर आधारित मुंशी प्रेमचंद की एक कालजयी कहानी.




हल्कू ने आकर स्त्री से कहा, ‘सहना आया है, लाओ, जो रुपए रखे हैं, उसे दे दूं, किसी तरह गला तो छूटे.’
मुन्नी झाड़ू लगा रही थी. पीछे फिरकर बोली, ‘तीन ही तो रुपए हैं, दे दोगे तो कम्मल कहां से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी? उससे कह दो, फसल पर दे देंगे. अभी नहीं.’ 
हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा. पूस सिर पर आ गया, कम्मल के बिना हार में रात को वह किसी तरह नहीं जा सकता. मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियां जमावेगा, गालियां देगा. बला से जाड़ों में मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी. यह सोचता हुआ वह अपना भारी- भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिद्ध करता था) स्त्री के समीप आ गया और ख़ुशामद करके बोला, ‘ला दे दे, गला तो छूटे. कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूंगा.’
मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और आंखें तरेरती हुई बोली, ‘कर चुके दूसरा उपाय! जरा सुनूं तो कौन-सा उपाय करोगे? कोई खैरात दे देगा कम्मल?  न जाने कितनी बाकी है, जो किसी तरह चुकने ही नहीं आती. मैं कहती हूं, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर-मर काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुट्टी हुई. बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ है. पेट के लिए मजूरी करो. ऐसी खेती से बाज आए. मैं रुपए न दूंगी, न दूंगी.’
हल्कू उदास होकर बोला, ‘तो क्या गाली खाऊं?’
मुन्नी ने तड़पकर कहा, ‘गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है?’
मगर यह कहने के साथ ही उसकी तनी हुई भौहें ढीली पड़ गईं. हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भांति उसे घूर रहा था.
उसने जाकर आले पर से रुपए निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए. फिर बोली, ‘तुम छोड़ दो अबकी से खेती. मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी. किसी की धौंस तो न रहेगी. अच्छी खेती है! मजूरी करके लाओ, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस.’
हल्कू ने रुपए लिए और इस तरह बाहर चला मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हो. उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-कपटकर तीन रुपए कम्मल के लिए जमा किए थे. वह आज निकले जा रहे थे. एक-एक पग के साथ उसका मस्तक अपनी दीनता के भार से दबा जा रहा था.


पूस की रात 
-मुंशी प्रेमचंद 

पूस की ठंडी रात में खेत की रखवाली करने गया हल्कू क्यों नीलगायों द्वारा फसल बर्बाद करने के बावजूद ख़ुश था? खेती-किसानी की बदहाली पर आधारित मुंशी प्रेमचंद की एक कालजयी कहानी.




हल्कू ने आकर स्त्री से कहा, ‘सहना आया है, लाओ, जो रुपए रखे हैं, उसे दे दूं, किसी तरह गला तो छूटे.’
मुन्नी झाड़ू लगा रही थी. पीछे फिरकर बोली, ‘तीन ही तो रुपए हैं, दे दोगे तो कम्मल कहां से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी? उससे कह दो, फसल पर दे देंगे. अभी नहीं.’ 
हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा. पूस सिर पर आ गया, कम्मल के बिना हार में रात को वह किसी तरह नहीं जा सकता. मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियां जमावेगा, गालियां देगा. बला से जाड़ों में मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी. यह सोचता हुआ वह अपना भारी- भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिद्ध करता था) स्त्री के समीप आ गया और ख़ुशामद करके बोला, ‘ला दे दे, गला तो छूटे. कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूंगा.’
मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और आंखें तरेरती हुई बोली, ‘कर चुके दूसरा उपाय! जरा सुनूं तो कौन-सा उपाय करोगे? कोई खैरात दे देगा कम्मल?  न जाने कितनी बाकी है, जो किसी तरह चुकने ही नहीं आती. मैं कहती हूं, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर-मर काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुट्टी हुई. बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ है. पेट के लिए मजूरी करो. ऐसी खेती से बाज आए. मैं रुपए न दूंगी, न दूंगी.’
हल्कू उदास होकर बोला, ‘तो क्या गाली खाऊं?’
मुन्नी ने तड़पकर कहा, ‘गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है?’
मगर यह कहने के साथ ही उसकी तनी हुई भौहें ढीली पड़ गईं. हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भांति उसे घूर रहा था.
उसने जाकर आले पर से रुपए निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए. फिर बोली, ‘तुम छोड़ दो अबकी से खेती. मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी. किसी की धौंस तो न रहेगी. अच्छी खेती है! मजूरी करके लाओ, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस.’
हल्कू ने रुपए लिए और इस तरह बाहर चला मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हो. उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-कपटकर तीन रुपए कम्मल के लिए जमा किए थे. वह आज निकले जा रहे थे. एक-एक पग के साथ उसका मस्तक अपनी दीनता के भार से दबा जा रहा था.


आचार्य चतुरसेन शास्त्री की कहानी नामालूम-सी एक ख़ता

आचार्य चतुरसेन शास्त्री की कहानी नामालूम-सी एक ख़ता

नामालूम-सी एक ख़ता 
-आचार्य चतुरसेन शास्त्री 

‘आसान नहीं होता है, बादशाहों की बेग़म होना.’ बादशाह शाहजहां और उनकी बेग़म सलीमा की यह करुण कहानी इस कथन को सच साबित करती है.  



गर्मी के दिन थे. बादशाह ने उसी फागुन में सलीमा से नई शादी की थी. सल्तनत के झंझटों से दूर रहकर नई दुल्हन के साथ प्रेम और आनंद की कलोल करने वे सलीमा को लेकर कश्मीर के दौलतख़ाने में चले आए थे. 
रात दूध में नहा रही थी. दूर के पहाड़ों की चोटियां बर्फ से सफ़ेद होकर चांदनी में बहार दिखा रही थीं. आरामबाग़ के महलों के नीचे पहाड़ी नदी बल खाकर बह रही थी. मोतीमहल के एक कमरे में शमादान जल रहा था और उसकी खुली खिड़की के पास बैठी सलीमा रात का सौंदर्य निहार रही थी.
खुले हुए बाल उसकी फ़िरोज़ी रंग की ओढनी पर खेल रहे थे. चिकन के काम से सजी और मोतियों से गुंथी हुई फ़िरोज़ी रंग की ओढनी पर, कसी कमख़ाब की कुरती और पन्नों की कमरपेटी पर अंगूर के बराबर बड़े मोतियों की माला झूम रही थी. सलीमा का रंग भी मोती के समान था. उसकी देह की गठन निराली थी. संगमरमर के समान पैरों में जरी के काम के जूते पड़े थे, जिन पर दो हीरे दक-दक चमक रहे थे. 
कमरे में एक क़ीमती ईरानी कालीन का फ़र्श बिछा हुआ था, जो पैर रखते ही हाथ-भर नीचे धंस जाता था. सुगंधित मसालों से बने शमादान जल रहे थे. कमरे में चार पूरे क़द के आईने लगे थे. संगमरमर के आधारों पर सोने-चांदी के फूलदानों में ताज़े फूलों के गुलदस्ते रखे थे. दीवारों और दरवाज़ों पर चतुराई से गुंथी हुई नागकेसर और चम्पे की मालाएं झूल रही थीं, जिनकी सुगंध से कमरा महक रहा था. कमरे में अनगिनत बहुमूल्य कारीगरी की देश-विदेश की वस्तुएं करीने से सजी हुई थीं. 
बादशाह दो दिन से शिकार को गए थे. इतनी रात होने पर भी नहीं आए थे. सलीमा खिड़की में बैठी प्रतीक्षा कर रही थी. सलीमा ने उकताकर दस्तक दी. एक बांदी दस्तबस्ता हाजिर हुई. 
बांदी सुंदर और कमसिन थी. उसे पास बैठने का हुक्म देकर सलीमा ने कहा, ‘साकी, तुझे बीन अच्छी लगती है या बांसुरी?’ 
बांदी ने नम्रता से कहा, ‘हुजूर जिसमें ख़ुश हों.’ 
सलीमा ने कहा, ‘पर तू किसमें ख़ुश है?’ 
बांदी ने कम्पित स्वर में कहा, ‘सरकार! बांदियों की ख़ुशी ही क्या!’ 
सलीमा हंसते-हंसते लोट गई. बांदी ने बंशी लेकर कहा, ‘क्या सुनाऊं?’ 
बेगम ने कहा, ‘ठहर, कमरा बहुत गरम मालूम देता है, इसके तमाम दरवाज़े और खिड़कियां खोल दे. चिरागों को बुझा दे, चटखती चांदनी का लुत्फ़ उठाने दे और वे फूलमालाएं मेरे पास रख दे.’ 
बांदी उठी. सलीमा बोली, ‘सुन, पहले एक गिलास शरबत दे, बहुत प्यासी हूं.’ 
बांदी ने सोने के गिलास में ख़ुशबूदार शरबत बेगम के सामने ला धरा. बेगम ने कहा, ‘उफ्! यह तो बहुत गर्म है. क्या इसमें गुलाब नहीं दिया?’ 
बांदी ने नम्रता से कहा, ‘दिया तो है सरकार!’ 
‘अच्छा, इसमें थोड़ा-सा इस्तम्बोल और मिला.’ 
साकी गिलास लेकर दूसरे कमरे में चली गई. इस्तम्बोल मिलाया और भी एक चीज़ मिलाई. फिर वह सुवासित मदिरा का पात्र बेगम के सामने ला धरा. 
एक ही सांस में उसे पीकर बेगम ने कहा, ‘अच्छा, अब सुनो. तूने कहा था कि तू मुझे प्यार करती है; सुना, कोई प्यार का ही गाना सुना.’ 
इतना कह और गिलास को गलीचे पर लुढ़काकर मदमाती सलीमा उस कोमल मखमली मसनद पर ख़ुद भी लुढ़क गई और रस-भरे नेत्रों से साकी की ओर देखने लगी. साकी ने बंशी का सुर मिलाकर गाना शुरू किया: 
दुखवा मैं कासे कं मोरी सजनी... 
बहुत देर तक साकी की बंशी कंठ ध्वनि कमरे में घूम-घूमकर रोती रही. धीरे-धीरे साकी ख़ुद भी रोने लगी. साकी मदिरा और यौवन के नशे में चूर होकर झूमने लगी. 
गीत ख़त्म करके साकी ने देखा, सलीमा बेसुध पड़ी है. शराब की तेज़ी से उसके गाल एकदम सुर्ख़ हो गए हैं और और ताम्बुल-राग रंजित होंठ रह-रहकर फड़क रहे हैं. सांस की सुगंध से कमरा महक रहा है. जैसे मंद पवन से कोमल पत्ती कांपने लगती है, उसी प्रकार सलीमा का वक्षस्थल धीरे-धीरे कांप रहा है. प्रस्वेद की बूंदें ललाट पर दीपक के उज्ज्वल प्रकाश में मोतियों की तरह चमक रही हैं. 
बंशी रखकर साकी क्षणभर बेगम के पास आकर खड़ी हुई. उसका शरीर कांपा, आंखें जलने लगी, कंठ सूख गया. वह घुटने के बल बैठकर बहुत धीरे-धीरे अपने आंचल से बेगम के मुख का पसीना पोंछने लगी. इसके बाद उसने झुककर बेगम का मुंह चूम लिया. 
फिर ज्यों ही उसने अचानक आंख उठाकर देखा, तो पाया ख़ुद दीन-दुनिया के मालिक शाहजहां खड़े उसकी यह करतूत अचरज और क्रोध से देख रहे हैं. 
साकी को सांप डस गया. वह हतबुद्धि की तरह बादशाह का मुंह ताकने लगी. बादशाह ने कहा, ‘तू कौन है? और यह क्या कर रही थी?’
साकी चुप खड़ी रही. बादशाह ने कहा, ‘जवाब दे!’
साकी ने धीमे स्वर में कहा, ‘जहांपनाह, कनीज अगर कुछ जवाब न दे, तो?’ 
बादशाह सन्नाटे में आ गए, ‘बांदी की इतनी हिम्मत?’ 
उन्होंने फिर कहा, ‘मेरी बात का जवाब नहीं? अच्छा, तुझे निर्वस्त्र करके कोड़े लगाए जाएंगे!’
साकी ने अकम्पित स्वर में कहा, ‘मैं मर्द हूं.’ 
बादशाह की आंखों में सरसों फूल उठी. उन्होंने अग्निमय नेत्रों से सलीमा की ओर देखा. वह बेसुध पड़ी सो रही थी. उसी तरह उसका भरा यौवन खुला पड़ा था. उनके मुंह से निकला, ‘उफ्! फाहशा!’ और तत्काल उनका हाथ तलवार की मूठ पर गया. फिर उन्होंने कहा, ‘दोज़ख के कुत्ते! तेरी यह मजाल!’
फिर कठोर स्वर से पुकारा, ‘मादूम!’
एक भयंकर रूप वाली तातारी औरत बादशाह के सामने अदब से आ खड़ी हुई. बादशाह ने हुक्म दिया, ‘इस मरदूद को तहख़ाने में डाल दे, ताकि बिना खाए-पिए मर जाए.’ 
मादूम ने अपने कर्कश हाथों से युवक का हाथ पकड़ा और ले चली. थोड़ी देर बाद दोनों एक लोहे के मज़बूत दरवाज़े के पास आ खड़े हुए. तातारी बांदी ने चाभी निकाल दरवाज़ा खोला और क़ैदी को भीतर ढकेल दिया. कोठरी की गच क़ैदी का बोझ ऊपर पड़ते ही कांपती हुई नीचे धसकने लगी!

नामालूम-सी एक ख़ता 
-आचार्य चतुरसेन शास्त्री 

‘आसान नहीं होता है, बादशाहों की बेग़म होना.’ बादशाह शाहजहां और उनकी बेग़म सलीमा की यह करुण कहानी इस कथन को सच साबित करती है.  



गर्मी के दिन थे. बादशाह ने उसी फागुन में सलीमा से नई शादी की थी. सल्तनत के झंझटों से दूर रहकर नई दुल्हन के साथ प्रेम और आनंद की कलोल करने वे सलीमा को लेकर कश्मीर के दौलतख़ाने में चले आए थे. 
रात दूध में नहा रही थी. दूर के पहाड़ों की चोटियां बर्फ से सफ़ेद होकर चांदनी में बहार दिखा रही थीं. आरामबाग़ के महलों के नीचे पहाड़ी नदी बल खाकर बह रही थी. मोतीमहल के एक कमरे में शमादान जल रहा था और उसकी खुली खिड़की के पास बैठी सलीमा रात का सौंदर्य निहार रही थी.
खुले हुए बाल उसकी फ़िरोज़ी रंग की ओढनी पर खेल रहे थे. चिकन के काम से सजी और मोतियों से गुंथी हुई फ़िरोज़ी रंग की ओढनी पर, कसी कमख़ाब की कुरती और पन्नों की कमरपेटी पर अंगूर के बराबर बड़े मोतियों की माला झूम रही थी. सलीमा का रंग भी मोती के समान था. उसकी देह की गठन निराली थी. संगमरमर के समान पैरों में जरी के काम के जूते पड़े थे, जिन पर दो हीरे दक-दक चमक रहे थे. 
कमरे में एक क़ीमती ईरानी कालीन का फ़र्श बिछा हुआ था, जो पैर रखते ही हाथ-भर नीचे धंस जाता था. सुगंधित मसालों से बने शमादान जल रहे थे. कमरे में चार पूरे क़द के आईने लगे थे. संगमरमर के आधारों पर सोने-चांदी के फूलदानों में ताज़े फूलों के गुलदस्ते रखे थे. दीवारों और दरवाज़ों पर चतुराई से गुंथी हुई नागकेसर और चम्पे की मालाएं झूल रही थीं, जिनकी सुगंध से कमरा महक रहा था. कमरे में अनगिनत बहुमूल्य कारीगरी की देश-विदेश की वस्तुएं करीने से सजी हुई थीं. 
बादशाह दो दिन से शिकार को गए थे. इतनी रात होने पर भी नहीं आए थे. सलीमा खिड़की में बैठी प्रतीक्षा कर रही थी. सलीमा ने उकताकर दस्तक दी. एक बांदी दस्तबस्ता हाजिर हुई. 
बांदी सुंदर और कमसिन थी. उसे पास बैठने का हुक्म देकर सलीमा ने कहा, ‘साकी, तुझे बीन अच्छी लगती है या बांसुरी?’ 
बांदी ने नम्रता से कहा, ‘हुजूर जिसमें ख़ुश हों.’ 
सलीमा ने कहा, ‘पर तू किसमें ख़ुश है?’ 
बांदी ने कम्पित स्वर में कहा, ‘सरकार! बांदियों की ख़ुशी ही क्या!’ 
सलीमा हंसते-हंसते लोट गई. बांदी ने बंशी लेकर कहा, ‘क्या सुनाऊं?’ 
बेगम ने कहा, ‘ठहर, कमरा बहुत गरम मालूम देता है, इसके तमाम दरवाज़े और खिड़कियां खोल दे. चिरागों को बुझा दे, चटखती चांदनी का लुत्फ़ उठाने दे और वे फूलमालाएं मेरे पास रख दे.’ 
बांदी उठी. सलीमा बोली, ‘सुन, पहले एक गिलास शरबत दे, बहुत प्यासी हूं.’ 
बांदी ने सोने के गिलास में ख़ुशबूदार शरबत बेगम के सामने ला धरा. बेगम ने कहा, ‘उफ्! यह तो बहुत गर्म है. क्या इसमें गुलाब नहीं दिया?’ 
बांदी ने नम्रता से कहा, ‘दिया तो है सरकार!’ 
‘अच्छा, इसमें थोड़ा-सा इस्तम्बोल और मिला.’ 
साकी गिलास लेकर दूसरे कमरे में चली गई. इस्तम्बोल मिलाया और भी एक चीज़ मिलाई. फिर वह सुवासित मदिरा का पात्र बेगम के सामने ला धरा. 
एक ही सांस में उसे पीकर बेगम ने कहा, ‘अच्छा, अब सुनो. तूने कहा था कि तू मुझे प्यार करती है; सुना, कोई प्यार का ही गाना सुना.’ 
इतना कह और गिलास को गलीचे पर लुढ़काकर मदमाती सलीमा उस कोमल मखमली मसनद पर ख़ुद भी लुढ़क गई और रस-भरे नेत्रों से साकी की ओर देखने लगी. साकी ने बंशी का सुर मिलाकर गाना शुरू किया: 
दुखवा मैं कासे कं मोरी सजनी... 
बहुत देर तक साकी की बंशी कंठ ध्वनि कमरे में घूम-घूमकर रोती रही. धीरे-धीरे साकी ख़ुद भी रोने लगी. साकी मदिरा और यौवन के नशे में चूर होकर झूमने लगी. 
गीत ख़त्म करके साकी ने देखा, सलीमा बेसुध पड़ी है. शराब की तेज़ी से उसके गाल एकदम सुर्ख़ हो गए हैं और और ताम्बुल-राग रंजित होंठ रह-रहकर फड़क रहे हैं. सांस की सुगंध से कमरा महक रहा है. जैसे मंद पवन से कोमल पत्ती कांपने लगती है, उसी प्रकार सलीमा का वक्षस्थल धीरे-धीरे कांप रहा है. प्रस्वेद की बूंदें ललाट पर दीपक के उज्ज्वल प्रकाश में मोतियों की तरह चमक रही हैं. 
बंशी रखकर साकी क्षणभर बेगम के पास आकर खड़ी हुई. उसका शरीर कांपा, आंखें जलने लगी, कंठ सूख गया. वह घुटने के बल बैठकर बहुत धीरे-धीरे अपने आंचल से बेगम के मुख का पसीना पोंछने लगी. इसके बाद उसने झुककर बेगम का मुंह चूम लिया. 
फिर ज्यों ही उसने अचानक आंख उठाकर देखा, तो पाया ख़ुद दीन-दुनिया के मालिक शाहजहां खड़े उसकी यह करतूत अचरज और क्रोध से देख रहे हैं. 
साकी को सांप डस गया. वह हतबुद्धि की तरह बादशाह का मुंह ताकने लगी. बादशाह ने कहा, ‘तू कौन है? और यह क्या कर रही थी?’
साकी चुप खड़ी रही. बादशाह ने कहा, ‘जवाब दे!’
साकी ने धीमे स्वर में कहा, ‘जहांपनाह, कनीज अगर कुछ जवाब न दे, तो?’ 
बादशाह सन्नाटे में आ गए, ‘बांदी की इतनी हिम्मत?’ 
उन्होंने फिर कहा, ‘मेरी बात का जवाब नहीं? अच्छा, तुझे निर्वस्त्र करके कोड़े लगाए जाएंगे!’
साकी ने अकम्पित स्वर में कहा, ‘मैं मर्द हूं.’ 
बादशाह की आंखों में सरसों फूल उठी. उन्होंने अग्निमय नेत्रों से सलीमा की ओर देखा. वह बेसुध पड़ी सो रही थी. उसी तरह उसका भरा यौवन खुला पड़ा था. उनके मुंह से निकला, ‘उफ्! फाहशा!’ और तत्काल उनका हाथ तलवार की मूठ पर गया. फिर उन्होंने कहा, ‘दोज़ख के कुत्ते! तेरी यह मजाल!’
फिर कठोर स्वर से पुकारा, ‘मादूम!’
एक भयंकर रूप वाली तातारी औरत बादशाह के सामने अदब से आ खड़ी हुई. बादशाह ने हुक्म दिया, ‘इस मरदूद को तहख़ाने में डाल दे, ताकि बिना खाए-पिए मर जाए.’ 
मादूम ने अपने कर्कश हाथों से युवक का हाथ पकड़ा और ले चली. थोड़ी देर बाद दोनों एक लोहे के मज़बूत दरवाज़े के पास आ खड़े हुए. तातारी बांदी ने चाभी निकाल दरवाज़ा खोला और क़ैदी को भीतर ढकेल दिया. कोठरी की गच क़ैदी का बोझ ऊपर पड़ते ही कांपती हुई नीचे धसकने लगी!

करें ऐसी साज-संभाल कि आपकी साड़ी चले पीढ़ी दर पीढ़ी

करें ऐसी साज-संभाल कि आपकी साड़ी चले पीढ़ी दर पीढ़ी


आपने कई बार सुना होगा कि युवतियां, नई-नई शादीशुदा युवतियां और यहां तक कि कई महिलाएं भी जब साड़ी पहनती हैं तो इस बात का ज़िक्र करती हैं कि यह साड़ी उनकी मां, दादी या नानी से उन्हें विरासत में मिली है. यदि आप भी अपनी साड़ियों की देखभाल इस तरह करना चाहती हैं कि आपकी साड़ियां पीढ़ी दर पीढ़ी चलें तो आप सही आलेख पढ़ रही हैं. यहां हम आपको साड़ियों की देखभाल का सही तरीक़ा बता रहे हैं...

1. साड़ियों की देखभाल के सामान्य नियम

पहली धुलाई के दौरान: जब आप पहली बार साड़ी धो रही हों पानी में हल्का-सा नमक डालें. इसे साड़ी का रंग नहीं निकलेगा, जिससे वह बदरंग नहीं होगी.
कैसा साबुन इस्तेमाल करें: अधिकतर डिटर्जेंट्स में बहुत ही कठोर केमिकल्स होते हैं, जो साड़ियों के नाज़ुक फ़ैब्रिक पर बुरा असर डालते हैं. इससे आपकी साड़ी के रेशे निकल सकते हैं. अत: बहुत ज़रूरी है कि साड़ियों को सौम्य या ऑर्गैनिक डिटर्जेंट से धोएं.
मशीन में कभी न धोएं: साड़ी को वॉशिंग मशीन में धोना यानी उसकी उम्र घटाना, रंग को बदरंग करना. साड़ियों को या तो हाथ से धोएं या फिर ड्राइक्लीन कराएं.
जब करना हो आयरन: जब भी साड़ी को प्रेस यानी आयरन करना हो तो इसे दो सूती कपड़ों के बीच रखकर आयरन करें.
साड़ी हैंगर पर टांगनी हो तो: यूं तो कई तरह की साड़ियों को हैंगर पर टांगना ही नहीं चाहिए, लेकिन जिन साड़ियों को हैंगर पर टांगा जा सकता है, हर छह महीने बाद दूसरी ओर से उन्हें तह कर के टांगना चाहिए. यानी उनकी तह बदलते रहना चाहिए.
कीड़ों से बचाने के लिए: प्राकृतिक रेशों से बनी साड़ियों में कीड़े लगने की संभावना होती है. ऐसी साड़ियों अत: उन्हें रखते समय नैप्थिलीन बॉल्स डाल देना चाहिए.
जब लग जाए दाग़: यदि आपकी साड़ी में दाग़ लग जाए तो इस पर ठंडा पानी डाल कर निकालने का प्रयास करें. बजाय डिटर्जेंट के आप नहाने के साबुन से इस दाग़ को हटाने की कोशिश करें. यदि दाग़ तेल का है तो पहले इस पर टैल्कम पाउडर लगाएं. जब यह सूख जाए, तभी इसे छुड़ाने की कोशिश करें. दाग़ छुड़ाने के लिए आप साड़ी को ड्राइक्लीनर से भी धुलवा सकती हैं.



2. यूं करें ज़री वाली साड़ियों की देखभाल
* हर छह माह में ज़री की साड़ियों को दो-तीन घंटे के लिए हल्की धूप दिखाएं. इससे उनमें फ़ंगस नहीं लगेगी.
* उन्हें दोबारा अलमारी में रखने से पहले उनकी तह को पलट दें. इससे ज़री ख़राब नहीं होने पाएगी.
* संभव हो तो इन्हें तह करने के बाद कपड़े के कवर के भीतर रख कर अलमारी में रखें.

3. सिल्क की साड़ी की साज-संभाल
* सिल्क की साड़ियों को कभी-भी मेटर के हैंगर्स पर न टांगें.
* इन्हें सूती कपड़े के बैग में इस तरह रखें कि ये नमी से बची रहें.
* सिल्क की साड़ियों को नमी से लगने वाली फ़ंगस से बचाने के लिए सिलिका जेल का इस्तेमाल करें.

4. भारी काम वाली एम्बेलिश्ड साड़ियों को यूं सहेजें
* जिन साड़ियों में भारी काम किया गया  हो उन्हें उल्टा तह करें यानी काम वाला हिस्सा तह में अंदर की ओर आए.
* इन साड़ियों के पिछले हिस्से पर आप नेट लगवा सकती हैं, ताकि यहां से धागे न टूटने पाएं और आपकी साड़ी ख़राब न होने पाए.
* ऐसी साड़ियों को हैंगर पर नहीं टांगना चाहिए अन्यथा भारी काम की वजह से साड़ी का कपड़ा फट सकता है.


आपने कई बार सुना होगा कि युवतियां, नई-नई शादीशुदा युवतियां और यहां तक कि कई महिलाएं भी जब साड़ी पहनती हैं तो इस बात का ज़िक्र करती हैं कि यह साड़ी उनकी मां, दादी या नानी से उन्हें विरासत में मिली है. यदि आप भी अपनी साड़ियों की देखभाल इस तरह करना चाहती हैं कि आपकी साड़ियां पीढ़ी दर पीढ़ी चलें तो आप सही आलेख पढ़ रही हैं. यहां हम आपको साड़ियों की देखभाल का सही तरीक़ा बता रहे हैं...

1. साड़ियों की देखभाल के सामान्य नियम

पहली धुलाई के दौरान: जब आप पहली बार साड़ी धो रही हों पानी में हल्का-सा नमक डालें. इसे साड़ी का रंग नहीं निकलेगा, जिससे वह बदरंग नहीं होगी.
कैसा साबुन इस्तेमाल करें: अधिकतर डिटर्जेंट्स में बहुत ही कठोर केमिकल्स होते हैं, जो साड़ियों के नाज़ुक फ़ैब्रिक पर बुरा असर डालते हैं. इससे आपकी साड़ी के रेशे निकल सकते हैं. अत: बहुत ज़रूरी है कि साड़ियों को सौम्य या ऑर्गैनिक डिटर्जेंट से धोएं.
मशीन में कभी न धोएं: साड़ी को वॉशिंग मशीन में धोना यानी उसकी उम्र घटाना, रंग को बदरंग करना. साड़ियों को या तो हाथ से धोएं या फिर ड्राइक्लीन कराएं.
जब करना हो आयरन: जब भी साड़ी को प्रेस यानी आयरन करना हो तो इसे दो सूती कपड़ों के बीच रखकर आयरन करें.
साड़ी हैंगर पर टांगनी हो तो: यूं तो कई तरह की साड़ियों को हैंगर पर टांगना ही नहीं चाहिए, लेकिन जिन साड़ियों को हैंगर पर टांगा जा सकता है, हर छह महीने बाद दूसरी ओर से उन्हें तह कर के टांगना चाहिए. यानी उनकी तह बदलते रहना चाहिए.
कीड़ों से बचाने के लिए: प्राकृतिक रेशों से बनी साड़ियों में कीड़े लगने की संभावना होती है. ऐसी साड़ियों अत: उन्हें रखते समय नैप्थिलीन बॉल्स डाल देना चाहिए.
जब लग जाए दाग़: यदि आपकी साड़ी में दाग़ लग जाए तो इस पर ठंडा पानी डाल कर निकालने का प्रयास करें. बजाय डिटर्जेंट के आप नहाने के साबुन से इस दाग़ को हटाने की कोशिश करें. यदि दाग़ तेल का है तो पहले इस पर टैल्कम पाउडर लगाएं. जब यह सूख जाए, तभी इसे छुड़ाने की कोशिश करें. दाग़ छुड़ाने के लिए आप साड़ी को ड्राइक्लीनर से भी धुलवा सकती हैं.



2. यूं करें ज़री वाली साड़ियों की देखभाल
* हर छह माह में ज़री की साड़ियों को दो-तीन घंटे के लिए हल्की धूप दिखाएं. इससे उनमें फ़ंगस नहीं लगेगी.
* उन्हें दोबारा अलमारी में रखने से पहले उनकी तह को पलट दें. इससे ज़री ख़राब नहीं होने पाएगी.
* संभव हो तो इन्हें तह करने के बाद कपड़े के कवर के भीतर रख कर अलमारी में रखें.

3. सिल्क की साड़ी की साज-संभाल
* सिल्क की साड़ियों को कभी-भी मेटर के हैंगर्स पर न टांगें.
* इन्हें सूती कपड़े के बैग में इस तरह रखें कि ये नमी से बची रहें.
* सिल्क की साड़ियों को नमी से लगने वाली फ़ंगस से बचाने के लिए सिलिका जेल का इस्तेमाल करें.

4. भारी काम वाली एम्बेलिश्ड साड़ियों को यूं सहेजें
* जिन साड़ियों में भारी काम किया गया  हो उन्हें उल्टा तह करें यानी काम वाला हिस्सा तह में अंदर की ओर आए.
* इन साड़ियों के पिछले हिस्से पर आप नेट लगवा सकती हैं, ताकि यहां से धागे न टूटने पाएं और आपकी साड़ी ख़राब न होने पाए.
* ऐसी साड़ियों को हैंगर पर नहीं टांगना चाहिए अन्यथा भारी काम की वजह से साड़ी का कपड़ा फट सकता है.

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